25 अक्टूबर को 823वीं जयंती पर हिन्दुशाही और धर्मरक्षा के लिए गुलाम वंश के शासकों के खिलाफ अंतिम सांस तक संघर्ष करने वाले रोहिलखंड के इस अत्यंत वीर और प्रतापी राजा के बारे में बता रहे हैं -समय सिंह पुंडीर
भारतीय इतिहास में जब जब गुलाम वंश के विरूद्ध हिन्दुशाही के विद्रोह और संघर्ष की बात आएगी, तब-तब रोहिलखंड के शासक महाराजा रणवीर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा जिन्होंने गुलामवंश के नसीरूददीन महमूद उर्फ के खिलाफ न केवल न अपना अभूतपूर्व शौर्य दिखाया बल्कि अन्तिम सांस तक दिल्ली में गुलाम वंश के विरूद्ध लडते लडते अपना सर्वस्व देश और धर्म के लिए न्यौछावर कर दिया। 25 अक्टूबर को रोहिलखंड के ऐसे महान और धर्मरक्षक शासक को नमन है।

महाराजा रणवीर सिंह का जन्म रामपुर यानि रोहिलखंड के राजा त्रिलोक सिंह के परिवार में 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी में हुआ। 1225 ईस्वी में 21 वर्ष की युवावस्था में रणवीर विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी के साथ परिणय सूत्र में बंध गए। इसी वर्ष रोहिलखंड के राजा के रूप में उनका राजतिलक हुआ। यह वह दौर था तब दिल्ली में गुलामवंश का शासन था और उसके शासक प्रत्येक हिन्दूशाही राज्य को हडपकर अपने अधीन कर लेना चाहते थे। रोहिलखंड राज्य के शासकों ने हमेशा दिल्ली के ऐसे शासकों से संघर्ष किया और रोहिला राज्य में घुसने नहीं दिया। रणवीर सिंह ने भी ऐसा ही किया। सन 1236 से 1240रजिया सुल्तान, 1242 में इजुददीन बहराम, 1226 में अलाउददीन महमूद शाह की सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला ने कठेहर रोहिलखंड राज्य का लोहा मनवाया और किसी को भी रोहिलखंड की सीमा पार नहीं करने दी। कहते हैं कि उस समय राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ विभिन्न राजवंशों के चैरासी अजेय योद्धा थे। राठौड, गौड ,चैहान, वारेचा, वाच्छिल और परमार आदि ये सभी योद्धा लोहे के कवचधारी और अत्यंत बलशाली थे।
जब दिल्ली सुल्तान के सेनापति नसीरूददीन बहराम, चंगेज उर्फ नसीरूददीन महमूद ने सन 1253 में दोआब कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों में विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान चलाया। इतनी मारकाट और तबाही मचाची कि बच्चें, स्त्रियां और वृद्ध कोई सुरक्षित नहीं रहा। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिलखंड शासकों ने दिल्ली के सूबेदार ताजुल मुल्क इज्जुदीन डोमिशी को मार डाला। दिल्ली का सुल्तान गुस्से से आग बबूला हो उठा और उसने रोहिलखंड के विरूद्ध और कडा रूख अपना लिया। तब रोहिलखंड के राजा रणवीर सिंह ने आसपास की दूसरी राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा और दिल्ली के सुल्तान के विरूद्ध अपनी क्रांतिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाए रखा। डोमिशी के मारे जाने के बाद नसीस्दीन महमूद उद्धेलित था। वह भारी फौज लेकर सहारनपुर (उशीनर प्रदेश) के मंडावर व मायापुर से लेकर गंगापार तक जा पहंुचा। विद्रोह को दबाता हुआ रोहिलखंड को रौंदता हुआ बदायू पहंचा। जहां उसे पता चला कि रामपुर में राजा रणवीर बेहद शक्तिशाली है और उसके विरूद्ध आसानी से जीत हासिल नहीं हो सकती तो उसने दिल्ली दरबार मेें सहायता के लिए गुहार लगाई। दिल्ली के दरबार में सन्नाटा था कि आखिर एक छोटे से राज्य कठेहर रोहिलखंड को रोहिला राजपूतों से कैसे छीना जाए। इसी दौरान नसीरूददीन महमूद ने रणवीर सिंह के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। रामपुर और पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरूदीन और रोहिला वीर राजा रणवीर सिंह की सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। छह हजार रोहिला राजपूत सैनिकों और 84 लोहे केकवचधारियों ने राजपूत सेना नायकों ने नसीरूददीन की तीस हजारी सेना के पैर उखाड दिए। नसीरूददील को बंदी बनाया गया।बाद में जब नसीरूददीन ने बचीहुई सेना के हाथी, घोडे और एक लाख सिक्के राजा रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना औार प्राणदान मांगा। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणगत को रणवीर सिंह ने अभयदान दे दिया, पर शायद यही राजा रणवीर चूक गए।
धोखेबाज नसीरूददीन, जो राजा रणवीर सिंह पर विजय के पाने के मकसद से आया था,फिर रोहिलखंड के खिलाफ षडयंत्र बुनने में लग गया। रामपुर का राजा बनने के लालच में एक दरबारी गोकुल राम पाण्डेय दुश्मन से जा मिला। नसीरूददीन उससे रामपुर के किले के भेद लेता रहा। गोकुल के खबर देने पर नसीरूददीन ने रक्षाबंधन के दिन उस दिन अचानक अपनी सेना के साथ हमला कर दिया जब सभी राजपूत निशस्त्र होकर किले में शिवमंदिर में शस्त्र पूजा कर रहे थे। कहते है कि राजा को अपने साथियों के साथ पूजा में तल्लीन पाकर गोकुल ने किले का द्वार खोल दिया और किले के बाहर जमी नसीरूददीन की सेना ने सभी को अपने घेरे में ले लिया। राजपूत भौचक्क थे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मंदिर से तुलसी के पत्ते लेकर मुंह में रखे तथा शाका बोल दिया। राजा रणवीर निशस्त्र होते हुए नसीरूददीन और उसके सैनिकों से भिड गए। उन्होंने एक विधर्मी की ही खडग छीन ली और घमासान युद्ध हुआ।आक्रांताओं के सिर कट कट कर गिर रहे थे। बताते है कि उस समय किले में सिर्फ तीन हजार राजपूत थे और वे भी निहत्थे रह गए थे। सभी राजपूत पूरी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए। विधर्मी सेना ने रणवीर सिंह की पीठ पर तलवारों से वार करके काट डाला लेकिन अदम्य शौर्य और साहस वाले रणवीर ने अंतिम सांस तक दुश्मन का पूरी बहादुरी से सामना किया। आखिरकार रोहिलखंड का यह बहादुर नरेश वीरगति को प्राप्त हुआ।जिसे देखकर नसीरूददीन भी चकित रह गया। तब नसीरूदीन ने भेदिए गोकुल से कहा था कि जिसका तुमने नमक खाया, जब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी अन्त जरूरी है। गोकुल का सिर भी धड से अलग पडा था। बाद में रानी तारा देवी अपने पति राजा रणवीर सिंह के शव के साथ सती हो गयी। कहते है कि रामपुर के किले के खंडहर और सती तारा देवी का मंदिर आज भी उनकी शौर्यगाथा कहते नजर आते हैं।
